Cheti Chand Jhulelal Jayanti 2029: झूलेलाल जयंती हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है। इस दिन को भगवान झूलेलाल के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन जलीय जीव को भोजन कराना काफी शुभ माना जाता है। सिंधी समाज के लोग अपने इष्टदेव भगवान झूलेलाल की जयंती बड़ी ही धूमधाम से मनाते हैं जो चेटीचंड (Cheti Chand) के नाम से जानी जाती है। सिंधी समाज प्राचीन काल में जल मार्ग के द्वारा किया करता था इसलिए उनके देवता भी जड़ से जुड़े हुए हैं। इनकी मान्यता के अनुसार भगवान झूलेलाल भी जल देवता के ही अवतार हैं, इन्हें उदेरोलाल साईं आदि नामों से जाना जाता है।
उदेरोलाल ने जनता को एकता शांति और सत्य का मार्ग दिखाया, मुस्लिमों में इन्हें ख्वाजा ख्वाजा जिंदा पीर के नाम से मशहूर है। प्राचीन काल में जब सिंधी समुदाय व्यापार के लिए जलमार्ग से जाते थे। तो इनकी स्त्रियां उनके सकुशल लौटने के लिए जल देवता से मन्नतें मांगती थी, और जब पुरुष सकुशल लौट आते थे, तो चेटी चण्ड पर्व पर भंडारे का आयोजन किया जाता था। भगवान झूलेलाल ज्योति स्वरूप में विराजमान है, आज भी झूले लाल मंदिरों में इनकी अखंड ज्योति प्रज्जवलित रहती है, झूलेलाल जयंती (Jhulelal Jayanti) के दिन जल देवता की पूजा की जाती है।
क्योंकि भगवान झूलेलाल को भी जल देवता का ही रूप माना जाता है। इस दिन सिंधी समाज के लोग नदी या समुद्र के किनारे एकत्रित होते हैं। इसके बाद आटे की लोई पर दीपक, मिश्री, सिंदूर, लौंग, इलायची, और फल रखकर भगवान झूलेलाल की पूजा करते है। पूजा के समय चेटीचंड जू लक-लक बदायूं के नारे लगाते है। इसके बाद उन सभी सामगी को नदी या समुद्र में बहा देते है, सभी चीजों को बहाने के बाद सभी लोग झूलेलाल जी से बुरी शक्तियों से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं।
2029 में झुलेलाल जयंती कब है: Cheti Chand Jhulelal Jayanti 2029 Date Time
| व्रत त्यौहार | व्रत त्यौहार समय |
|---|---|
| झूलेलाल जयंती | 15 अप्रैल 2029, दिन रविवार |
| द्वितीया तिथि प्रारम्भ होगी | 14 अप्रैल 2029, सुबह 03:09 मिनट पर |
| द्वितीया तिथि समाप्त होगी | 15 अप्रैल 2029, सुबह 05:३२ मिनट पर |
| पूजा का शुभ मुहूर्त | 15 अप्रैल २०29, शाम 06:47 से शाम 08:10 मिनट तक |
| पूजा की अवधि | 01:23 मिनट तक |
झूलेलाल जयंती पूजा विधि Jhulelal Jayanti Puja Vidhi
झूलेलाल जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, और पूजा स्थल को साफ कर भगवान झूलेलाल की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद एक कांसे के बर्तन या थाली में पानी, लाल कपड़े में लिपटा नारियल, और आटे का बड़ा दीपक (जिसमें पांच बत्तियां हों) रखें। इसके बाद भगवान को फूल, माला, फल, और सुगंधित अगरबत्ती अर्पित करें। इसके बाद प्रसाद के रूप में भगवान झुलेलाल (Jhulelal Jayanti) को विशेष रूप से ‘ताहिरी’ (मीठे चावल), चने और फल का भोग लगाये। इसके बाद भजन कीर्तन करते हुए भगवान झुलेलाल की आरती करे। इसके बाद शाम को गाजे-बाजे के साथ बहिराणा साहिब को नदी या तालाब के किनारे ले जाकर जल में विसर्जित किया जाता है। पूजा के अंत में ‘पल्लव’ पढ़ा जाता है, जिसमें भगवान से सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत के लिए प्रार्थना की जाती है।
झूलेलाल जयंती की कथा Jhulelal Jayanti Ki Katha
झूलेलाल जयंती की कथा के अनुसार सिंध प्रदेश में मिरक साह नामक बहुत ही क्रूर राजा का शासन हुआ करता था। उसकी अत्याचार से दुखी होकर लोगों ने 40 दिनों तक श्रद्धापूर्वक जल किनारे पूजा किया। इसके बाद जल देवता मनुष्य के रूप में आए और उन्होंने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि- वह जल्द ही राजा की अत्याचारों का अंत करने के लिए जन्म लेंगे। इसके बाद चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन ठाकुर रत्न लाल के घर माता देवकी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम उदेरोलाल रखा गया।
जब मिरक साह को उदेरोलाल के जन्म के बारे में पता चला तो उसने उसे मरवाने की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हो सका। जिसके बाद राजा के महल में अचानक से आग लग गई अपने सैनिकों की हार और आग के डर से बादशाह गिरकर झूलेलाल जी के चरणों में जा गिरा। इस तरह बाल्य अवस्था से ही इनके चमत्कारों के कारण भगवान झूलेलाल की आस्था प्रबल हो गई। इसलिए भगवान झूलेलाल के जन्मोत्सव को सिंधी समुदाय के लोग चेटीचंड (Cheti Chand) पर्व के नाम से भी मनाते हैं, मान्यता है कि इस दिन मांगी हुई मन्नत अवश्य ही पूरी होती है।
