Ugadi 2030: हिंदी पंचांग के अनुसार उगादि पर्व हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व हिन्दू नव वर्ष के आगमन की खुशी में मनाया जाता है। उगादि पर्व मुख्य रूप से दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य जैसे – आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक में बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। लेकिन उगादी पर्व को महाराष्ट्र में गुडी पडवा के रूप में मनाया जाता है। उगादी पर्व (Ugadi Parva) की शुरूआत एक सप्ताह पहले से ही हो जाती है।
इस दिन लोग अपने अपने घरों की साफ-सफाई, रंगाई-पोताई आदि करते हैं। और नए कपड़ों के साथ त्यौहार से संबंधित सभी ज़रूरी सामानों की ख़रीदारी भी करते हैं। और उगादी के दिन लोग सुबह-सुबह जगकर सूर्योदय से पहले स्नान करते हैं और आम के पत्तों से बने तोरण से घर के दरवाज़ों को सजाते हैं। और आज के दीन से ही सभी शुभ कार्य, जैसे सादी विवाह, भवन निर्माण कार्य शुरू हो जाते है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार आज के दिन ही भगवान ब्रम्हा जी ब्रमांड की रचना की थी। इसलिए दक्षिण भारत के कुछ राज्यो में भगवान ब्रम्हा जी की पूजा की जाती है। तो वही धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने आज के दिन ही सर्व कल्याण के लिए मत्य का अवतार भी लिया था। इस लिए आज के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होगा है। और फसल की पैदावार अच्छी होती है।
ऐसी मान्यता है कि उगादि (Ugadi Parva) के दिन सफेद कपड़ा विछाकर उसपर हल्दी से चावल को रंगकर अष्टदल बनाकर उसपर भगवान ब्रम्हा जी की मूर्ति स्थापित करने से ब्रह्मा जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते है साल 2030 में उगादि पर्व (Ugadi Parva) कब है? 03 या 04 अप्रैल, नोट करे, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, महत्व
2030 में उगादि पर्व कब है, Ugadi 2030 Date And Time
| व्रत त्यौहार | व्रत त्यौहार समय |
|---|---|
| उगादी पर्व | 03 अप्रैल 2030, दिन बुधवार |
| प्रतिप्रदा तिथि प्रारम्भ | 03 अप्रैल 2030, सुबह 03:31 मिनट पर |
| प्रतिप्रदा तिथि समाप्त | 04 अप्रैल 2030, सुबह 05:18 मिनट पर |
उगादि पूजा विधि Ugadi Puja Vidhi
उगादि पर्व के दिन सुबह जल्दी उठकर शरीर पर तिली का तेल और उबटन लगाकर तालाब, पोखर, या गंगा नदी में स्नान करें। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान ब्रम्हा जी की मूर्ति या फिर फ़ोटो एक लकड़ी की चौकी पर स्थापित करे। या फिर साफ कपड़े पहनकर ब्रम्हा जी के मंदिर में जाकर धूप, दिप से उनकी पूजा करे। इसके बाद हाथ मे गंगाजल, गंध, चमेली और पुष्प आदि लेकर भगवान ब्रह्मा जी के मंत्रो का जाप करे। इसके बाद आरती करके पूजा समाप्त करे।
