Dasha Mata Vrat Puja Vidhi: हिन्दू धर्म मे दशा माता व्रत का विशेष महत्व होता है। यह व्रत हिंदी पंचांग के अनुसार हर साल चैत्र मात्र के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को दशामाता की पूजा अर्चना की जाती है। दशामाता (Dasha Mata) माता पार्वती का ही स्वरूप है। इस दिन सभी व्रती महिलाए अपने घर की विगड़ी हुई दशा को सुधारने के लिए और पति बच्चों की लंबी आयु के लिए व्रत उपवास रखती है। और मातादशा से अपने पूरे परिवार की सुख समृद्धि कामना करती है।
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इसके बाद माता दशा की पूजा अर्चना करने के बाद महिलाएं दशामाता का डोरा को गले में साल भर तक धारण करती हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है और घर के सदस्यों की उन्नति होती है। लेकिन जो महिलाये इस दौरे को पूरे साल भर तक धारण नहींकर सकती है तो वह महिला वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में कोई भी अच्छा दिन देखकर माता के चरणों में अर्पित कर सकती है। मान्यता इस व्रत में आप जितना साफ सफाई का ध्यान रखेगे उतना ही लाभ आदिक मिलेगा। अब आईये जानते है दशामाता (Dasha Mata) की पूजा विधि
दशा माता पूजा विधि – Dasha Mata Vrat Puja Vidhi
दशामाता व्रत के दिन सभी व्रती महिलाएं यानी चैत्र मास के दशमी तिथि के दिन सभी सुहागिन व्रती महिलाएं कच्चे सूत का 10 डोरा लेकर उसमें 10 गाठे लगाती है। इसके बाद पीपल के वृक्ष के निचे बैठकर पीपल वृक्ष की पूजा अर्चना करती है और पीपल वृक्ष में 10 बार डोरा लपेटते हुए पीपल वृक्ष की परिक्रमा करती हैं। इसके बाद नल दमयंती की कथा पड़ती है या फिर सुनती है। फिर उस डोरे को गले में धारण कर लेती हैं। इसके बाद महिलाएं घरों पर हल्दी और कुमकुम के छापे लगाती हैं। और व्रती महिलाएं केवल एक ही बार वीना नमक का बना हुआ भोजन करती हैं। मान्यता है जो महिलाये इस व्रत को एक बार कर लेती है तो पूरे जीवन भर करना पड़ता है क्योकि इस व्रत का उद्यापन नही किया जाता है।
